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जातिगत राजनीति के आइने में चमक रहा विरोध का चेहरा

जातिगत राजनीति के आइने में चमक रहा विरोध का चेहरा

- पापुलर वेबसीरीज मिर्जापुर-2 के विरोध का ठोस कारण नहीं

- रिसर्चः ज्यादातर वेबसीरीज में एससी-एसटी लीड रोल में नही

काशीलाइव । मिर्जापुर

हालिया रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पाॅपुलर वेबसीरीज मिर्जापुर-2 के अखंडानंद त्रिपाठी हों या गुड्डू पंडित, कोटा फैक्टरी का लीड किरदार वैभव पांडेय हों या पंचायत के अभिषेक तिवारी, द फैमिली के श्रीकांत तिवारी हों या वेब सीरीज असुर के मुख्य पात्र धनंजय राजपूत। देश में बनने वाले ज्यादातर वेब सीरीज के मुख्य पात्र एससी-एसटी या ओबीसी नहीं बन पाते। इसे संयोग मानें या सामाजिक तानाबाना, लेकिन अब इसी को आधार बनाकर राजनीति से जुडे़ लोग वेब सीरीज का विरोध या समर्थन कर रहेे हैं।

मिर्जापुर वेबसीरीज का विरोध तब चालू हुआ जब जिले की सांसद व पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने इसके खिलाफ ट्वीट किया। उन्होंने प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को टैग करके इस वेबसीरीज को बंद कराने की मांग उठाई। इसके पीछे जो वजह बताई गई वह ये कि यह सीरीज मिर्जापुर की छवि को खराब करने वाली है। लेकिन यदि ऐसा ही है, तो मुंबई के लोग भी विरोध कर सकते हैं कि उनके शहर की छवि फिल्मों में गलत क्यों दिखाई जाती है। इतना ही नहीं कल पुलिस केे लोग, राजनेता भी विरोध करना चालू कर देंगे कि उन्हें ज्यादातर मामलों में खलनायक जैसा क्यों दिखाया जाता है। आम लोगों का मानना है कि इस तरह से तो रचनात्मक स्वतंत्रता सिर्फ किताबों तक ही सिमट कर रह जाएगी। तब फिल्म बनाने से पहले लेखक-निर्देशक को वहां के जातीय समीकरणों का भी अध्ययन करना पडेगा और उसी के अनुसार पात्रों का चयन भी।

इंस्टाग्राम पर हुए हालिया सर्वे में भी यह बात सामने आई है कि देश में इस समय पापुलर 111 वेब सीरीज या शो में 67 पात्र ऊंची जाति के है जबकि इनकी कुल आबादी करीब 31 फीसदी है। वहीं 111 वेबसीरीज में पात्र पांच फीसदी मुख्य किरदार पिछडी जातियों से हैं। जबकि इनकी आबादी 60 फीसदी से ज्यादा है। ऐसे में यह सवाल उठाना आवश्यक है कि आखिर क्यों ऐसे पात्र ही मुख्य किरदार के तौर पर चुने जाते हैं जो उंची जातियों का प्रतिनिधित्व करते हों। ओबीसी या एससी-एसटी मुख्य किरदार क्यों नहीं बनते। 

मिर्जापुर की हकीकत यह है

जनपद की सांसद का विरोध कई मायनों में सही भी है, क्योंकि जिस तरह की मारकाट दिखाई गई है, जैसी गालियां दिखाई गई हैं, वैसा कुछ भी जमीन पर नहीं है। लेकिन जहां तक विकास की बात है तो यह भी सच है जिले में उसी का सिक्का चलता है। जिसकी पुलिस-प्रशासन में धमक है। विकास के सारे टेंडर उन्हीं के खाते में क्यों जाते हैं, इस पर भी जनप्रतिनिधियों को ध्यान देना चाहिए। विकास के नाम पर मची लूट की बंदरबांट करने वालों का भी विरोध होना चाहिए।



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