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छोटे लोगों के साथ 'फ्लश' नहीं खेलते एआरटीओ के बड़े बाबू

छोटे लोगों के साथ 'फ्लश' नहीं खेलते एआरटीओ के बड़े बाबू

- *दिवालीनामा*

मनोज द्विवेदी । मिर्जापुर

ओवरलोडिंग के खेल में हिचकोले खा रहे एआरटीओ के अधिकारी भले ही एसटीएफ जांच की आंच झेल रहे हैं लेकिन विभाग की आरामकुर्सी पर पसरे बाबुओं के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। इतना ही नहीं किए गए तमाम झोल की झोले भर फ़ाइल दबाने के बावजूद उनके बोल बेकाबू हैं।

दरअसल मिर्जापुर एआरटीओ कार्यालय में माइकल शूमाकर की तरह सारे रेस जीतने वाले एक बड़े बाबू हैं। जिनका शगल है कि वे छोटे लोगों के साथ दिवाली पर फ्लश तक नहीं खेलते। वे सिर्फ बड़े नाम वाले लोगों के साथ ही गेम एन्जॉय करते हैं। खैर, अपना बखान खुद ही करने के आदती शूमाकर साहब की हाल ही में मुलाकात एक खबर खोजी से हुई। पहले तो उन्होंने पहचानने से इंकार किया और कोशिश रही कि रत्ती भर भाव न दिया जाए। लेकिन बातों का फलसफा आगे बढ़ा तो थोड़े नार्मल हुए। लेकिन अगले ही पल बड़े बाबू ने खबरनवीस के कई बड़े बॉस के नाम दनादन गिना दिए। बड़े बाबू के इस तीर से सामने वाले का संभलना मुश्किल था फिर भी उसने सामान्य रहने की भरसक कोशिश जारी रखी। इसी बीच आसपास बैठे उनके प्रायोजित समर्थकों ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि बड़े बाबू आप भी फ्लश खेलते हैं? तो उन्होंने कातिलाना मुस्कान को छुपाते हुए मारक हंसी बिखेरी। साथ ही सभी बड़े लोगों के साथ फ्लश खेलने के बेहद निजी पलों को गर्व गाथा की तरह सुनाने लगे। इधर खुद झट से नौकर बना दिए गए खबरनवीस के पैंट की बकल ही उखड़ चुकी थी जिसे छुपाना भी जरूरी था। बड़े बाबू की संज्ञाओं से सराबोर जब वह निकलने लगा तो उनके आभामंडल की विजयी मुस्कान से चौंधिया सा गया। देखा कि बड़े बाबू के चहेतों की गर्दन गर्व से तनती जा रही है। इसी बीच मैनेज कला में निपुणता की डिग्री हासिल कर चुके बड़े बाबू ने हौले से कहा, कल आइयेगा, आपको दिवाली की मिठाई जरूर खिलाऊंगा। खबरनवीस ने मन ही मन बड़े बाबू की काबिलियत को सलाम ठोंका क्योंकि वह जान चुका था कि सरकारी विभागों में ऐसे करतबी बाबुओं के रहते हर मैटर, मेटल की तरह सेटल हो जाएगा।

*बिजली वाले बड़े बाबू भी कम नहीं*

कुछ दिन पहले ही मझवां क्षेत्र का एक गरीब पेंटर जो कभी-कभी सरकारी विभागों की रंगाई, पुताई, लिखाई भी मुफ्त में कर देता है। बिजली विभाग के लपेटे में फंस गया। हुआ यूं कि स्थानीय जेई से उसके ब्रश, पेंट रखने वाले कमरे को दुकान माना और कमर्शियल कनेक्शन के लिए चुन लिया। फ़ाइल तैयार हो गई और पेंटर के नाम करीब 10 हजार की आरसी कट गई। वह कागज लेकर फतहां बिजली दफ्तर के एक बड़े बाबू के पास पहुंचा। बाबू लोग पहले घन्टे तक तो बिहार चुनाव पर डिबेट करते रहे फिर कई बार हाथ जोड़ने पर बोले कि हर्जाना तो भरना ही पड़ेगा। अगले घन्टे भर चाय, चुक्कड़, चुनावी चर्चा चलती रही। लंच का टाइम आया और साहब उठकर जाने लगे। अचानक उन्हें गरीब पेंटर पर तरस आया और उसे कागज थमाते हुए बोले कि जेई से यह लिखवा लो कि तुमने दुकान बंद कर दी है। और हां दिवाली से पहले ही आना ताकि कुछ रियायत कर दूं। वह पेंटर अभी भी जेई के पीछे भाग रहा है और बड़े बाबू दिवाली से पहले उसके स्वागत का इंतजार कर रहे हैं।



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